साहित्यसंगीतकला विहीन: साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः ।( साहित्य संगीत और कला से हीन पुरूष साक्षात् पशु ही है जिसके पूँछ और् सींग नहीं हैं । )— भर्तृहरि