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सुभाषित 10

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कोई व्यक्ति कितना ही महान क्यों न हो, आंखे मूंदकर उसके पीछे न चलिए। यदि ईश्वर की ऐसी ही मंशा होती तो वह हर प्राणी को आंख, नाक, कान, मुंह, मस्तिष्क आदि क्यों देता ?
- विवेकानंद

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सुभाषित

जब फ़ांसी की सज़ा से बचने के लिए गैलेलिओ ने चर्च से क्षमा मांग ली तो उसके एक अनुयायी ने गुस्से और निराशा में टिप्पणी की: 'कितना अभागा होता है वह समाज, जिसका कोई नायक नहीं होता।'

महान वैज्ञानिक गैलेलियो का उत्तर था :' लेकिन उससे अभागा होता है वह समाज, जिसे नायक की ज़रूरत होती है।'