रिश्तो की बुनियाद क्या होनी चाहिये ? आपसी विश्वास और समझबूझ ही ना ! लेकिन इन लोगो को क्या कहें जो रिश्तो की शुरूवात ही झूठ की बूनियाद पर करना चाहते है! ऐसा भी नही है कि ये लोग झूठ बोलना चाहते है। हमारा सामाजिक परिवेश ही कुछ ऐसा हो गया है कि ना चाहते हुये भी लोगो को झूठ बोलना या झूठ गढ़ना पड़ता है।
अब आप सोचेंगे कि आज इस खालीपीली को क्या हो गया जो ऐसी समझदारी भरे उपदेश देने लगा ! अब क्या करें, हमारी भी मजबूरी है कि हम जिस अवस्था मे प्रवेश करने जा रहे है उस अवस्था मे समझदार का तमगा लगाना जरूरी हो जाता है। ज्यादा बड़ी भूमीका ना बनाते हुये हम मुद्दे पर आते है।
कुछ समय पहले की बात है, यही कोई तीन चार साल पहले। उस समय मै विप्रो मे नया नया आया था साथ ही और मेरी दो बहनो मे से बड़ी का रिश्ता तय हो गया था। उस समय मेरी अपनी शादी की कोई योजना नही थी, लेकिन रिश्ते आने शुरू हो गये थे। एक दिन एक सज्जन अपनी कन्या का रिश्ता लेकर मेरे घर आये। मैने उन्हे कम से कम दो तीन वर्ष अपनी शादी ना करने की योजना के बारे मे बताया। मना करने के बावजूद भी वे कन्या की फोटो और जन्मकुंडली देकर चले गये। सौजन्यता से हमने फोटो जन्मकुंडली रख ली। शाम को ऐसे ही हम लोग बाते कर रहे थे। मेरे भाई ने मस्ती मे उस कन्या की कुंडली मेरी कुंडली से मिलाने के लिये कम्युटर चालु कर दिया। उसने मेरी जन्मतिथी और कन्या की जन्मतिथी कम्प्युटर मे डाली। परिणाम देखकर वह चकरा गया। कन्या की कुंडली, कम्युटर की कुंडली से एकदम अलग थी। मैने उसे जन्मतिथी फिर से जांचने ले लिये कहा, उसने फिर मे पूरी जानकारी फीर से डाली परिणाम वही ढाक के तीन पात। मैने अपने भाई से कहा कि जन्मवर्ष बदल कर देखे। उससे कन्या की उम्र एक वर्ष बढा कर देखा। इस बार कम्प्युटर द्वारा बनायी गयी कुंडली और कन्या के पिता द्वारा दी गयी कुंडली मील गयी थी। बाद मे पता चला कि कन्या मुझसे एक वर्ष बडी़ थी इसलिये उसके पिता ने जो बायोडाटा हम लोगो को दिया था उसमे उसकी जन्मतिथी बदल दी थी। अब क्या कहें ? मान लेते है कि मै कुंडली नही मिलाता और ये भी मान लेते है कि ये रिश्ता हो जाता । किसी दिन ये झूठ पकड़ मे आने पर क्या होता ?
इस घटना से चार वर्ष बाद मेरी दूसरी बहन की शादी भी हो गयी। मेरे बहन की शादी तुरंत बाद ही मेरी शादी के लिये कुछ प्रस्ताव आ गये थे। मेरा छोटा भाई इन सभी प्रस्तावो को देख रहा था। मेरी और मेरे भाई दोनो का एक ही विचार था कि लड़की देखने के बेहुदा कार्यक्रम से बचा जाये। लेकिन हम लोग इससे बच नही सकते थे तो यह निश्चित किया गया कि सभी बायोडाटाओ से सबसे अच्छे २-३ बायोडाटाओ को अलग कर लो। इन २-३ बायोडाटाओ मे से एक रिश्ते को ही अंतिम रूप दे दो। अब इन सभी बायोडाटाओ मे से २-३ को चुनना एक मुश्किल काम था। पहला फिल्टर लगाया गया कि जो भी रिश्ते हम लोगो के रिश्तेदारो ने भीजवाये है उन्हे अलग कर दो। यहां हम लोगो को मालूम था कि ये रिश्ते मेरे लिये यानी 'आशीष' के लिये नही, विप्रो के प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये आये है। दूसरा फिल्टर था कि रिश्ते लेकर आये लोगो का व्यव्हार कैसा था। जहां भी हमे दिखावे या शानो शौकत वाली बात दिखी उन्हे अलग कर दिया गया। एक महाशय जब रिश्ता लेकर आये थे तब उन्होने द्वार पर ही पहला वाक्य कहा था कि मै इस शादी मे १५-२० लाख तक खर्च कर सकता हूं।
वैसे सबसे बड़ा फिल्टर मेरी कुंडली थी। मेरी कुंडली मंगली है, जिससे होता यह था कि कुछ प्रस्ताव तो कन्यापक्ष द्वारा वापिस ले लिये जाते थे।
इन सबके बाद हम लोगो के पास तीन प्रस्ताव बचे थे। पहला रिश्ता राजनांदगांव(नीरज दिवान का गांव ), दूसरा भिलाई का और तीसरा जबलपूर से था।
फरवरी के मध्य मे मुझे अपने गृह नगर गोंदिया अपने अंतिम कुंवारे दोस्त के विवाह पर जाना था। हमने भी सोचा कि चलो इस दौरान इन तीन प्रस्तावो पर भी गौर फरमाया जाये। तीनो कन्यापक्षो को सूचना दे दी कि हम इस दिन इस समय पहुंच रहे है। १६ फरवरी की सुबह मै और मेरा छोटा भाई दोनो सुबह सुबह सज धज कर चल दिये। पहला पढा़व राजनांदगांव(निरज दिवान का राजनांदगांव) का था। इस पढा़व पर अंत मे आते है।
राजनांदगांव से हम चले इस्पात नगरी भिलाई की ओर। बस स्टैंड पर कन्या का भाई हमे लेने के लिये आया हुआ था। घर पहुंचने के बाद सबसे पहला कार्य उन्होने किया अपना घर दिखाने का। हम दोनो भाई एक दूसरे की ओर देख कर मुस्करा रहे थे। बाद मे वे कहने लगे कि ये उनके घर की पहली शादी है इसलिये शादी धूमधाम और तरिके से होगी। हम शब्दो का अर्थ समझ रहे थे। इसके बाद अंत मे कन्या आयी। कन्या को देखने के बाद हम दोनो भाई चकरा गये। कन्या को पहली नजर देखने के बाद हम लोग समझ गये थे कि जो तस्वीरे हमे दी गयी थी, उसमे साथ धूमधाम और तरिके से छेड़छाड़ की गयी थी। वह एक डीजीटल तस्वीर थी जिसमे फोटोशाप जैसे किसी टूल से बदलाव किये गये थे। मुझे सबसे ज्यादा चिढ़ जिस चिज से होती है वह है झूठ से..। मन कसैला हो गया था। हम लोग वापिस आ गये।
दूसरे दिन हम लोगो को जबलपूर जाना था। मेरी छोटी बहन और दामाद भी जबलपूर आ रहे थे, इसलिये हम लोगो ने मम्मी को भी साथ ले लिया था। जबलपूर पहुंचकर हम मेरी छोटी बहन के साथ उसके मामा ससूर के घर पहुंचे। वहां से तैयार हो कर कन्या पक्ष के घर पहुंचे। हम लोगो को बताया गया था कि कन्या भी मेरे क्षेत्र यानी आई टी मे काम करती है। वह भी मांगलिक है। उंचाई भी अच्छी है। कन्या के घर अच्छे से आवभगत हुयी। यहां पर भी लोग शुरू हो गये कि उनके घर मे पिछली शादी कैसे हुयी थी, कितना खर्च हुआ था वगैरह वगैरह...। मै और मेरा भाई अरूचि से सुनते रहे।
कन्या चाय की ट्रे लेकर आयी। फिर वही बात सामने आयी। तस्वीर के साथ छेड़छाड़ वाली। हमने सोचा चलो कोई बात नही। कन्या से जब मै बात कर रहा था तब पता चला कि वह मेरे क्षेत्र मे नही, विपणन के क्षेत्र मे है। बाद मे यह भी पता चला कि उसके बायोडाटा मे उसकी उम्र भी गलत है, ये कन्या मुझसे ७ वर्ष छोटी थी। बातो बातो मे उस कन्या ने यह भी कहा कि वह अपने करीयर के लिये गंभीर है।
हम लोग वापिस चल दिये गोंदिया अपने गृहनगर की ओर। पूरे रास्ते हम लोग इसी बात पर चर्चा करते रहे कि लोग पता नही शादी विवाह जैसी महत्वपूर्ण मौको पर झूठ का सहारा लेते है। तस्वीरो के साथ डीजीटली छेड़छाड़ करते है। गलत जानकारी दी जाती है। जबकि ये सारी बाते आमने सामने होने पर खुल कर आ जाती है।
अब हम आते है सबसे पहले पढाव राजनांदगांव की ओर। कन्या की जो तस्वीर हम लोगो के पास थी वह एकदम साधारण थी। ध्यान दे हमने यह कहा है कि तस्वीर साधारण थी नाकि कन्या। कन्या के बायोडाटा से हमे यह भी मालूम था कि यह एक मध्यम वर्गीय परिवार है, इसलिये दिखावे और शानोशौकत की उम्मीदे नही थी। लेकिन चक्कर यह था कि मै कन्या पक्ष का पता और फोन नम्बर अपने कार्यालय के कम्युटर चेन्नई मे भूल आया था। अब क्या किया जाये। कानपूर अनुप शुक्लाजी(अरे अपने फुरसतियाजी ) को SOS भेजा गया। उनकी मदद से कन्या के मामाश्री का नम्बर मीला। मामाश्री को हमने अपनी ट्रेन का नाम और समय बताया। उन्होने हमे बताया कि रेल्वे स्टेशन पर कन्या का भाई हमे लेने आ जायेगा।
राजनांदगांव पहुंचे, कन्या का भाई रेल्वे स्टेशन पर आया था। उसके साथ उसके घर पहुंचे। उम्मीदो के अनुरूप एक मध्यम वर्गिय घर, कहीं कोई दिखावा नही। साधारण साज सज्जा।कुछ देर बैठने के बाद नाश्ता आया। चाय की ट्रे के साथ कन्या आयी। पता चला कि कन्या के मामाश्री ने जो तस्वीर हमे भेजी थी वो चार से पांच साल पूरानी थी। मुझे और कन्या को अकेला छोड़ दिया गया। मै चूपचाप कभी नही रहता लेकिन यहां पर बोलती बंद। समझ नही आ रहा था कि बात कहां से शुरू की जाये। खैर बातो का सीलसीला जो शुरू हुआ वह रूकने का नाम नही ले रहा था। कुल मीला कर हम दोनो भाईयो को कन्या पसंद थी।
सामने टेबील पर नाश्ता रखा था जो कि हम दोनो भाईयो को पसंद नही था। हमारी विशेष फरमाईश पर कन्या द्वारा आलूपोहा बनाया गया। आलूपोहा कैसा था हम ये अभी नही बतायेंगे।
अब चेन्नई वापिस आने के बाद हमने कन्या के मामाश्री को अपनी रजामंदी की चिठ्ठी भेजी , जिसका उत्तर उन्होने रसगुल्ले खाते हुये हमे दिया। होली के अगले दिन ५ मार्च को कन्या पक्ष वाले हमारे घर गोंदिया आये थे। उन्होने रिश्ते पर अपनी मुहर लगा दी है। और हमे अब विश्व कंवारा मंच के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे रहे है। अब कन्या राजनांदगांव से है तो सोचते है कि राजनांदगांव के नीरज दिवान को अपना उत्तराधिकारी घोषीत कर दें।
अब इस चिठ्ठे का सबसे बड़ा सस्पेंस यानी कि कन्या के मामाश्री अर्थात हमारे होने वाले मामा ससूर जी कौन हैं.........
आप अनुमान लगायें, हम उत्तर अगले चिठ्ठे मे देंगे ! हमने पर्याप्त हिंट दे दी है.........।